Up board 12th sanskrit natak sukti arth vyakhya

Up board 12th sanskrit natak sukti arth vyakhya

सूक्तिपरक वाक्यों की संदर्भ सहित व्याख्या

1 –गुणवते कन्यका प्रतिपादनीया ।

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति महाकवि कालिदास कृत ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या – शकुन्तला के साथ गान्धर्व विवाह के पश्चात् दुष्यन्त हस्तिनापुर चला गया। प्रियंवदा चिन्तित है कि पिता कण्व प्रवास से लौटने के बाद इस विवाह से प्रसन्न होंगे अथवा नहीं। अनसूया का कहना है कि तात काश्यप इससे प्रसन्न होंगे, क्योंकि ऐसा गुणवान् व्यक्ति उन्हें घर बैठे ही मिल गया है और गुणवान् व्यक्ति को ही कन्या देनी चाहिए।

2- दुःखशीले तपस्विजने कोऽभ्यताम् ?

सन्दर्भ-प्रस्तुत सूक्ति महाकवि कालिदास कृत ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या – अनसूया चिन्तित है कि यहाँ से जाने के पश्चात् दुष्यन्त ने यहाँ का कोई समाचार जानने का प्रयास नहीं किया। वह सोचती है कि यदि किसी सन्देशवाहक से पता लगाया जाय, तो यहाँ से किसे भेजा जाय। यहाँ के तपस्वी भला प्रेम-प्रसंग को क्या जानें। इसलिए इन चिड़चिड़े, तपस्वियों में से किससे प्रार्थना की जाय, समझ में नहीं आता।

3- न तादृशा आकृतिविशेषा गुणविरोधिनो भवन्ति ।

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या – अनसूया की चिन्ता का समाधान करती हुई प्रियंवदा कहती है कि “विश्वास रखो। राजा दुष्यन्त की जैसी सुन्दर आकृति है ऐसी आकृतियाँ कभी गुण विरोधिनी नहीं होती हैं क्योंकि ‘यत्राकृति तत्र गुणा वसन्ति’ ऐसा भी कहा जाता है।” इस प्रकार राजा भव्याकृति है और वह शकुन्तला को भुला नहीं सकता ।

4- कोsन्यो हुतवहाद् दुग्धुं प्रभवति ।

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित हैं।

हिन्दी व्याख्या – ऋषि दुर्वासा लौटते समय कुपित होकर शकुन्तला को शाप दे देते हैं, तब घबरायी हुई प्रियंवदा कहती है कि अग्नि के अतिरिक्त भला कौन जला सकता है। प्रियंवदा का मानना है, जिस प्रकार जलाना अग्नि का सहज गुण है, उसी प्रकार एकदम क्रोध आना और शाप देना दुर्वासा ऋषि का स्वभाव है। अतः ये निश्चित ही दुर्वासा हैं।

5- को नाम उष्णोदकेन नवमालिकां सिञ्चति ?

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या – प्रियंवदा से अनसूया कहती है कि दुर्वासा के शाप का वृत्तान्त वह शकुन्तला को न बताये। प्रियंवदा कहती है कि ऐसा कौन व्यक्ति है जो गर्म जल से नवमालिका को सींचे भाव यह है कि नवमालिका बहुत कोमल लता होती है, उसे यदि गर्म जल से सींचा जाये तो वह मुरझा जाती है। शकुन्तला भी स्वभाव से कोमल है, यदि उसे शाप की बात बतायी जायेगी तो उसकी वही दशा होगी जो गर्म जल से सींचने पर नवमालिका की होती है।

  1. तेजो द्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां अथवा लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु ।

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित हैं।

हिन्दी व्याख्या – समय का पता लगाने के लिए महर्षि काश्यप का एक शिष्य कुटिया से बाहर आता है। वह देखता है कि प्रभात हो गया। एक और चन्द्रमा छिप रहा है, तो दूसरी ओर सूर्य का उदय हो रहा है। इस प्रकार दो तेजस्वी पदार्थ एक ही समय में अस्त और उदय होकर अपनी विशेष दशाओं में मानो संसार को नियमित कर रहे हैं। संसार में दुःख-सुख का कोई नियम नहीं। यहाँ एक ही समय में एक दुःखी तो दूसरा सुखी रहता है। सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता रहता है। इससे शकुन्तला के भावी दुःख की व्यंजना होती है।

7 दिष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेरपि यजमानस्य पावक एव आहुतिः पतिता ।

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या —अनसूया को प्रियंवदा बताती है कि तीर्थयात्रा से वापस आने पर तात काश्यप ने शकुन्तला से कहा था कि पुत्री ! यह बहुत शुभ है कि यजमान की दृष्टि धुएँ से व्याकुल होने पर भी आहुति अग्नि में ही पड़ी। महर्षि का तात्पर्य यह है कि यदि यज्ञ करनेवाले की दृष्टि धुएँ से व्याकुल होने पर भी आहुति अग्नि में ही पड़े तो सौभाग्य की बात है। इसी प्रकार कोई युवती कामातुर होने पर किसी अयोग्य पुरुष से भी प्रेम कर सकती है किन्तु शकुन्तला ने कामुक होकर भी दुष्यन्त जैसे योग्य राजा को पति बनाया, यह उसके लिए सौभाग्य की बात है।

8- वत्से ! सुशिष्यपरिदत्ता विद्येव अशोचनीया संवृत्ता ।

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या —यह कश्यप ऋषि की प्रियंवदा द्वारा पुनरुक्ति है। महर्षि ने दुष्यन्त और शकुन्तला के विवाह के बाद कहा था कि तुम सुयोग्य शिष्य को दी गयी विद्या के समान अशोचनीय हो गयी हो। उनका तात्पर्य यह है कि कुशिष्य विद्या का दुरुपयोग करता है इसलिए कुशिष्य को दी गयी विद्या शोक का कारण हो जाती है। किन्तु सुयोग्य शिष्य को दी गयी विद्या सफल होती है, उसके विषय में कभी शोक नहीं होता। इस प्रकार सुयोग्य वर को दी गयी कन्या शकुन्तला के विषय में भी चिन्ता करने की कोई बात नहीं।

8- पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनया विश्लेषदुःखैर्नवैः ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या काश्यप ऋषि शकुन्तला के वियोग की आशंका में दुःखी है तथा वे कहते हैं कि जब हम जैसे वनवासी तपस्वी भी अपनी पुत्री के वियोग में इस प्रकार दुःखी होते हैं तब गृहस्थ लोग पुत्री के वियोग के दुःख में अधिक पीड़ित क्यों न होंगे। –

9-इष्ट प्रवासजनितान्यबलाजनस्य, दुःखानिनूनमतिमात्रसुदुःसहानि ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति नाटककार एवं महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।

प्रसंग – प्रस्तुत सूक्ति में कवि प्रकृति के माध्यम से मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रवास जाने से उत्पन्न वियोग के दुःख का प्रातः काल की बेला में शिष्य के द्वारा चित्रण करा रहा है। —

हिन्दी अनुवाद – निश्चय ही स्त्रीजनों को प्रियजन के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असहनीय होते हैं।

हिन्दी व्याख्या —-महाकवि कालिदास वस्तुस्थिति का यथावत् वर्णन करने में सिद्ध हस्त हैं। यहाँ पर सोकर उठे हुए कण्व – शिष्य ने प्रातः काल में चन्द्रमा को अस्त होते हुए देखा एवं कुमुदनी ने भी अपनी सुन्दरतम् आभा को समेटे हुए देखा है। कुमुदनी को प्रकाशित करने वाला चन्द्रमा मानो उसका प्रियजन है। उसके प्रवास में जाने से कुमुदनी मुरझा गयी है। वस्तुतः प्राकृतिक निर्जीव पदार्थों का स्वभाव है कि वे भी संयोग वियोग की संवेदना को अपनी प्रक्रिया से अभिव्यक्त कर देते हैं। इन्हें भी अपने प्रिय के समागम की अपेक्षा बनी रहती हैं। –

वस्तुतः जब कुमुदनी की चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर यह दशा हो जाती है। इसी प्रकार निश्चय ही स्वीजनों का प्रियजन के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असहनीय एवं कान्ति हीन हो जाता है। इसी प्रकार शकुन्तला की भी स्थिति दुष्यन्त के बिना ऐसी ही हो गयी है।

11- चित्रकर्म परिचयेनाङ्गेषु ते आभरण विनियोग कुर्वः ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति नाटककार एवं महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।

प्रसंग – प्रस्तुत अभिकथन शकुन्तला की दोनों सखियों द्वारा किया जा रहा है। वन में वृक्षों के अनुग्रह से शकुन्तला को अलंकृत करने के लिए प्राकृतिक आभूषण उपलब्ध करा दिये गये हैं। आश्रमवासी तपस्वी सदा अध्ययन में निरत रहने वाले हैं। वहाँ आभूषणों के माध्यम से कोई भी और कभी अपने को सजाता-संभारता नहीं है। इसलिए प्राप्त आभूषणों का उपयोग किन अंगों पर कैसे किया जाये का सजीव एवं सहज चित्रण किया गया है।

हिन्दी अनुवाद – चित्रों में जैसा अलंकरण देखा है उससे परिचित होने से तुम्हारे अंगों पर आभूषण पहनाती हैं।

हिन्दी व्याख्या–– प्रस्तुत अभिकथन का आशय कवि तद्कालीन आश्रम निवासियों के सरलतम जीवन शैली का – स्वाभाविक एवं सहज चित्रण कर रहा है। गुरु और शिष्य एवं शिष्यायें आश्रम में रहते हुए सांसारिक भोग-विलासिताओं की वस्तुओं एवं साधनों से सर्वथा अपरिचित हैं। यथा- शकुन्तला के लिए चनदेवता ने वृक्षों के अनुग्रह से आभूषण उपलब्ध करा दिये हैं। परन्तु पूर्व में उनका प्रयोग कभी नहीं किया और न किसी नगरीय जन को करते देखा है। इसलिए अब वे सखियाँ शकुन्तला को चित्रों में देख-देखकर ही आभूषण अनुकूल अंगों में पहनाती हैं।

  1. अनुपयुक्तभूषणोऽयं जनः ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति नाटककार एवं महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।

प्रसंग – प्रस्तुत सूक्ति में आश्रम से पतिगृह जाने से पूर्व शकुन्तला को विभिन्न प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित किया जा रहा है। दोनों सखियाँ शकुन्तला को आभूषण धारण कराते हुए कहती हैं कि-

हिन्दी अनुवाद – हम दोनों आभूषणों के उपयोग से अनभिज्ञ हैं अर्थात् आभूषणों का उपयोग नहीं किया गया है। हिन्दी व्याख्या इस प्रकार शकुन्तला की सखियाँ (अनसूया और प्रियंवदा) शकुन्तला को विदा करते हुए विभिन्न – प्रकार के आभूषण पहना रही हैं। अनभिज्ञ होने के कारण वे पुनः चित्रावली को देखते हुए विभिन्न अंगों पर आभूषण पहनाती हैं।

13- स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

हिन्दी व्याख्या –—आश्रम द्वार पर उपस्थित हुए दुर्वासा का स्वागत शकुन्तला नहीं करती, क्योंकि दुष्यन्त के ध्यान – में तल्लीन उसे दुर्वासा के आगमन का पता ही नहीं चला। क्रोध में दुर्वासा शकुन्तला को शाप दे देते हैं जिसके ध्यान में डूबी हुई तुम द्वार पर उपस्थित अतिथि को भी नहीं देख रही, वह तुम्हें उसी प्रकार स्मरण नहीं करेगा जैसे कोई पागल आदमी पहले की गयी बात को भूल जाता है।

14- आभरणोचितं रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैविप्रकार्यते ।

सन्दर्भ– प्रस्तुत सूक्ति नाटककार एवं महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है।

प्रसंग – शकुन्तला आश्रम से विदा होकर पति परिवार को प्रस्थान करने के लिए सखियों के द्वारा तैयार की जा रही है। विदाई के अवशोषित आभूषणों, वस्त्रों आदि से सजाई जा रही है परन्तु शकुन्तला की स्वाभाविक सुन्दरता इतनी अत्यधिक है कि अलंकरणों की शोभा भी उसके सामने फीकी पड़ रही है। शकुन्तला की सखी प्रियंवदा ऐसा अभिव्यक्त कर रही है-

हिन्दी अनुवाद – आभूषणों के योग्य रूप आश्रम में प्राप्त अलंकारों से विकृत किया जा रहा है।

हिन्दी व्याख्या ––• यह स्वाभाविक है कि शकुन्तला आश्रम में रहने वाली तपस्विनी की भाँति जीवन जीने वाली ऋषि – पुत्री है। उसके पितृ परिवार से पति परिवार की ओर प्रस्थान करने के अवसर के अनुकूल सभी जन उपस्थित हैं। अपनी-अपनी योग्यतानुसार विदाई से सम्बन्धित कार्यों में लगे हैं। सखियाँ सुसज्जित करने में व्यस्त हैं। परन्तु दुःख हैं कि पति पक्ष की ओर से विदाई की कोई पहल नहीं है। आभूषणों का अभाव है, आश्रमवासियों के पास कीमती आभूषणों का होना सर्वथा असम्भव है। ऐसी स्थिति में प्रियंवदा दुःखी होकर कह रही है कि शकुन्तला के रूप-सौन्दर्य के अनुकूल आश्रम में उपलब्ध अलंकार नहीं हैं। ये आभूषण तो शकुन्तला की सुन्दरता बढ़ाने के बजाय और घटा रहे हैं। वास्तविकता यही है कि महिलायें सदा आभूषणप्रिय होती हैं। ऐसे अवसर पर आभूषणों का अभाव उनके मन में हीनता एवं दयनीयता को जन्म देता है। गौरव और शोभा को बढ़ाने के लिए आभूषणों की अपेक्षा होना स्वाभाविक ही है। इसका चित्रण महाकवि ने सहज शब्दों में किया है जो मनोवैज्ञानिक एवं सहज स्वभाव है।

15- रक्षितव्या खलु प्रकृतिपेलवा प्रियसखी।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति नाटककार एवं महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से अवतरित है

प्रसंग— प्रस्तुत सूक्तिपरक वाक्य में अनसूया शकुन्तला के शाप से सम्बन्धित समाचार को अपने तक सीमित रखने के लिए प्रियंवदा से निवेदन कर रही है।

हिन्दी अनुवाद –– निश्चय ही स्वभाव से कोमल प्रियसखी (शकुन्तला ) की रक्षा करनी चाहिए। हिन्दी व्याख्या • इस प्रकार अनसूया का कहने का आशय अपने आप में इसलिए यथोचित हैं कि शकुन्तला जब अपने पति के वियोग जनित शोक में पूर्णरूपेण डूबी हुई है। उसे स्वयं अपना ही ध्यान नहीं है तो वह किसी दूसरे अभ्यागत का क्या ध्यान रख सकती है? इसलिए ऐसे समय में हम दोनों (अनसूया और प्रियंवदा) को यह शाप वृत्तान्त अपने तक ही सीमित रखना चाहिए अन्यथा वह (शकुन्तला ) जानकर और भी दुःखी होगी। जो कि हम दोनों के लिए चिन्ता का विषय हो जायेगा। यह सोचना स्वाभाविक रूप से सखियों का धर्म होता है।

16- अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्निगर्भा शमीमिव ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति कालिदास विरचित ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अङ्क से ली गयी है।

हिन्दी व्याख्या – प्रियंवदा अनसूया से कहती है कि महर्षि कण्व को शकुन्तला विषयक ज्ञान आकाशवाणी से इस प्रकार हुआ है- “हे ब्रह्मन् ! पृथ्वी के कल्याण हेतु दुष्यन्त द्वारा स्थापित वीर्य को धारण करती हुई पुत्री शकुन्तला को तुम अग्नि धारण करनेवाले शमी वृक्ष की भाँति समझो।”

17. ननूटजसन्निहिता शकुन्तला ।

सन्दर्भ-प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अङ्क से ली गयी है। इसके रचयिता महाकवि कालिदास हैं।

हिन्दी व्याख्या- ‘अयमहम् भोः ।’ महर्षि दुर्वासा के इस नेपथ्य कथन को सुनकर अनसूया एवं प्रियंवदा उसे ध्यान से सुनकर आपस में वार्तालाप करती हुई मञ्च से निकल जाती हैं। अनसूया ध्यान केन्द्रित कर सुनती है तथा प्रियंवदा से कहती है कि हे सखि! यह आवाज तो किसी अतिथि जैसी प्रतीत होती है। इस पर प्रियंवदा उत्तर देती है कि हे सखि, अतिथि आये हैं तो ठीक हैं, कोई चिन्ता की बात नहीं है क्योंकि निश्चय ही कुटिया में अतिथि सत्कारार्थ शकुन्तला मौजूद है। इसके तुरन्त बाद ही वह सोचती है कि अरे! शकुन्तला तो शरीर से ही कुटिया में स्थित है, लेकिन उसका हृदय तो हस्तिनापुर में है बेचारी शून्य हृदय से वहाँ बैठी है। इस प्रकार उसके पर्णशाला में रहने या न रहने से तो कोई लाभ नहीं है।

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