Up board class 12 sanskrit natak shakuntala ka charitra chitran

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शकुन्तला का चरित्र-चित्रण

शकुन्तला कालिदास द्वारा रचित नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् की नायिका है। वह ऋषि कण्व की पालिता-पुत्री है। उसके वास्तविक जननी जनक मेनका और विश्वामित्र हैं। शकुन्तला का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी का चरित्र है। उसके चरित्र में कई ऐसे गुण हैं, जो उसे नाटक का एक प्रभावशाली पात्र बनाने में बहुत सहायक सिद्ध हुए हैं।

(1) अनुपम सुन्दरी – शकुन्तला अत्यन्त सुन्दर है। उसके प्राकृतिक सौन्दर्य को बाह्य शृङ्गार की आवश्यकता नहीं है-

“इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी । “

राजा दुष्यन्त उसके अलौकिक रूप-सौन्दर्य को देखकर उस पर मुग्ध हो जाते हैं और उसके सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं-

“अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू।

कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम्॥”

( 2 ) शालीनता – शकुन्तला में शालीनता कूट-कूटकर भरी है। वह सुशीला और लज्जाशीला है। राजा दुष्यन्त के सानिध्य की आकाङ्क्षिणी होते हुए भी जब उसे ऐसा अवसर प्राप्त होता है, तो वह राजा से कहती है-

“मुञ्च तावन्मां भूयोऽपि सखीजनमनुमानयिष्ये।”

(3) पति-प्रेम- शकुन्तला अपने पति राजा दुष्यन्त से अत्यन्त प्रेम करती है, वह उनके वियोग में इतनी व्याकुल हो जाती है कि आश्रम में आये हुए ऋषि दुर्वासा का अतिथि सत्कार नहीं करती है और उनके शाप की भागी बनती है-

” विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा, तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम् । स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्, कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ॥”

( 4 ) प्रकृति-प्रेम- शकुन्तला को पेड़-पौधों, लता कुञ्जों, पशु-पक्षियों से विशेष अनुराग है। आश्रम से विदा होते समय वह आश्रम के वृक्षों, लताओं के साथ हरिणियों आदि से भी विदाई लेती है- अवैमि ते तस्यां सोदर्यास्नेहम् । (5) पितृ-प्रेम- अपने पिता ऋषि कश्यप के लिए उसके हृदय में अत्यधिक प्रेम एवं श्रद्धा है। अतएव पतिगृह जाते समय वह अपने पिता से बार-बार मिलती है और कहती है-

“कथमिदानीं तातस्याङ्कात् परिभ्रष्टमलयतटोन्मूलिता चन्दनलतेव देशान्तरे जीवितं धारयिष्यामि । “

(6) सखी – प्रेम – शकुन्तला एक सच्ची सखी है। वह अपनी सखियों प्रियंवदा एवं अनुसूया से विशेष अनुराग रखती है। आश्रम से विदा के समय सखियों से विदा होने का उसे अपार दुःख होता है। वह ऐसा अनुभव करती है कि सखियों के बिना उसका शृङ्गार दुर्लभ हो जायगा-

” इदमपि बहु मन्तव्यम् । दुर्लभमिदानीं मे सखीमण्डनं भविष्यति ॥ “

निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि कालिदास को शकुन्तला के रूप में एक आदर्श भारतीय नारी के प्रेममयी रूप का चित्रण करने में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है।

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