सदाचारः पर संस्कृत निबंध || Essay on Sadachar in Sanskrit language

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सदाचारः पर संस्कृत निबंध || Essay on Sadachar in Sanskrit language

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सदाचारः पर निबंध [2006, 07, 08, 12, 13]

[सम्बद्ध शीर्षक:- आचारः परमो धर्मः, सदाचारवान्नरः[2008]]

1 – सताम् आचारः सदाचारः कथ्यते ।

2 – सज्जना: यद् आचरन्ति, तदेव आचरणं सदाचारः कथ्यते ।

3 – सदाचारी जनः सर्वैः सह शिष्टतापूर्वकम् आचरति ।

4 – सः सत्यं वदति, नित्यं मातापितरौ अभिवादयति, गुरुजनानाम् आदरं करोति, परोपकारं च करोति ।

5 – मानव: सज्जनवत् आचरणेन सदाचारी, धार्मिकः विनीतः च भवति ।

6 – सदाचारयुक्तः जनः सर्वत्र आदरं लभते ।

7 – सदाचारेणैव बुद्धिः वर्धते, यश: प्रसरति, दुर्गुणाः दूरीभवन्ति, हृदये सद्भाव: जागर्ति आयुश्च वर्धते ।

8 – सदाचारः जनान् उन्नतपदे आरोपयति ।

9 – सदाचारिणः पापकर्मणिः प्रवृत्तिः न भवति, बुद्धिः निर्दोषा भवति । सः च जनानां हितचिन्तने प्रवृत्तः भवति ।

10 – अतः महर्षिभिः ‘आचारः परमो धर्मः’ इति उक्तं ।

11 – समस्त धर्मग्रन्थेषु आचारस्य महिमा वर्णि तास्ति ।

12 – आचारात् जनः आयुः, लक्ष्मी, कीर्ति च प्राप्नोति ।

13 – सदाचारपालनेन हरिश्चन्द्रः, दधीचिः, गान्धिमहोदयश्च यशः शरीरेण अद्यापि जीवन्ति ।

14 – अत: वयं सदा सदाचारिणः भवेम ।

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