UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 1 सन्त कबीरदास


साखी, पदावली (सन्त कबीरदास)


कवि पर आधारित प्रश्न


1 — कबीरदास जी का जीवन परिचय देते हुए हिन्दी साहित्य में उनका स्थान बताइए ॥
उत्तर—- – कवि परिचय- भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रमुख कवि सन्त कबीरदास के जन्म के विषय में कोई प्रामाणिक मत उपलब्ध नहीं है ॥ कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई० में माना जाता है ॥ ऐसा माना जाता है कि काशी में किसी विधवा ब्राह्मणी ने गुरु रामानन्द जी के आशीर्वाद से इन्हें जन्म दिया तथा लोक-लज्जावश वह इन्हें लहरतारा नामक तालाब पर छोड़ गई ॥ नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति ने वहाँ से जाते हुए इन्हें देखा ॥ वे नि:सन्तान थे अतः इन्हें उठा ले गए और उन्होंने पुत्र की भाँति इनका पालन-पोषण किया ॥

जन-श्रुतियों के आधार पर लोई नामक स्त्री से इनका विवाह हुआ ॥ इनके पुत्र का नाम कमाल व पुत्री का नाम कमाली था ॥ इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय काशी में ही व्यतीत किया ॥ उस समय ऐसी मान्यता थी कि काशी में मरने से स्वर्ग प्राप्त होता है तथा मगहर में मरने से नर्क प्राप्त होता है ॥ लोगों के मन की इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए इन्होंने जब अपना अन्तिम समय निकट जाना, तब ये मगहर चले गए ॥ वहाँ सन् 1518 ई० में माघ महीने की शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को इनका देहावसान माना जाता है ॥ इनकी मृत्यु के उपरान्त हिन्दू व मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदाय अपनी-अपनी रीति से इनका अन्तिम संस्कार करना चाहते थे ॥ जनश्रुति के आधार पर माना जाता है कि जब इनके शव पर से चादर हटाई गई, तब वहाँ शव के स्थान पर पुष्प मिले ॥ दोनों सम्प्रदाय के लोगों ने उन पुष्पों को आधा-आधा बाँट लिया तथा अपनी-अपनी रीति से उनका अन्तिम संस्कार किया ॥

हिन्दी साहित्य में स्थान- वास्तव में सन्त कबीर महान् विचारक, श्रेष्ठ समाज-सुधारक, परम योगी और ब्रह्म के सच्चे साधक थे ॥ इनकी स्पष्टवादिता, कठोरता, अक्खड़ता यद्यपि कभी-कभी नीरसता की सीमा तक पहुँच जाती थी; परन्तु इनके उपदेश आज भी सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने वाले हैं ॥ इनके द्वारा प्रवाहित की गई ज्ञान-गंगा आज भी सबको पावन करने वाली है ॥ कबीर में एक सफल कवि के सभी लक्षण विद्यमान थे ॥ ये हिन्दी-साहित्य की श्रेष्ठतम विभूति थे ॥ इन्हें भक्तिकाल की ज्ञानमार्गी व सन्तकाव्यधारा के प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है ॥ इनका दृष्टिकोण सारग्राही था और “अपनी राहू तू चल कबीरा” ही इनका आदर्श था ॥ इसमें सन्देह नहीं कि निर्गुण भक्तिधारा के पथप्रदर्शक के रूप में ज्ञानोपदेशक सन्त कबीर का नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा ॥

2 — कबीरदास जी की रचनाओं तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ॥

उत्तर—- – रचनाएँ- कबीरदास जी की रचनाओं की प्रमाणिकता यद्यपि नहीं हो पाई है लेकिन ऐसा माना जाता है कि इनके मुख से उच्चरित होने वाली वाणी को इनके शिष्य लिपिबद्ध कर लेते थे ॥ सन्त कबीर की रचनाएँ ‘कबीर ग्रन्थावली’ व ‘कबीर वचनावली’ में संगृहीत हैं ॥ इनकी रचनाओं को इनके शिष्यों ने ‘बीजक’ नामक संग्रह में प्रकाशित किया, जिसके तीन भाग हैं1 — साखी, 2 — सबद 3 — रमैनी

1 — साखी- साखी शब्द तत्सम शब्द साक्षी का तद्भव रूप है, इसमें इनके धार्मिक उपदेश संगृहीत हैं ॥ यह दोहा छन्द में लिखा गया है ॥

2 — सबद- सबद संगीतात्मकता से युक्त गेयपद है, इसमें कबीर के अलौकिक-प्रेम व आध्यात्मिकता के भाव मुखरित हुए हैं ॥

3 — रमैनी- इसमें कबीरदास के दार्शनिक व रहस्यवादी विचार मुखरित हुए हैं ॥ यह चौपाई छन्द में रचित है ॥ भाषा-शैली- कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे ॥ इन्होंने तो सन्तों के सत्संग से ही सब कुछ सीखा था ॥ इसीलिए इनकी भाषा साहित्यिक नहीं हो सकी ॥ इन्होंने व्यवहार में प्रयुक्त होने वाली सीधी-सादी भाषा में ही अपने उपदेश दिए ॥ इनकी भाषा में अनेक भाषाओं; यथा- अरबी, फारसी, भोजपुरी, पंजाबी, बुन्देलखण्डी, ब्रज, खड़ी बोली आदि के शब्द मिलते हैं ॥

इसी कारण इनकी भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा जाता है ॥ भाषा पर कबीर का पूरा अधिकार था ॥ कुछ अद्भुत अनुभूतियों को कबीर ने विरोधाभास के माध्यम से उलटबाँसियों की चमत्कारपूर्ण शैली में व्यक्त किया है, जिससे कहीं-कहीं दुर्बोधता आ गई है ॥ इन्होंने आवश्यकता के अनुरूप शब्दों का प्रयोग किया ॥ इसीलिए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ बताते हुए लिखा है- “भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था ॥ वे वाणी के डिक्टेटर थे ॥ जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है, उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया– बन गया है तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरेरा देकर ॥ ” कबीर ने सहज और सरस शैली में उपदेश दिए हैं, इसलिए इनकी उपदेशात्मक शैली क्लिष्ट अथवा बोझिल नहीं है ॥ उसमें स्वाभाविकता एवं प्रवाह है ॥ व्यंग्यात्मकता एवं भावात्मकता इनकी शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं ॥ ॥

कबीर ने अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है ॥ इन्होंने अलंकारों को कहीं भी थोपा नहीं है ॥ कबीर के काव्य में रूपक, उपमा, अनुप्रास, दृष्टान्त, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों के प्रयोग अधिक हुए हैं ॥ कबीर को दोहा और पद अधिक प्रिय रहे ॥ इन्होंने साखियों में दोहा तथा सबद व रमैनी में गेयपदों का प्रयोग किया है ॥ कबीर के काव्य में प्रतीकों की अधिकता है ॥ साधनात्मक रहस्यवाद में तो प्रतीक सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ सामान्यतः इन्होंने दीपक को हृदय, शरीर तथा ज्ञान का; तेल को प्रभुभक्ति का, अघटट बाती (साधुओं अथवा ज्ञानियों से की गई अटूट वार्ता) को आत्मज्ञानरूपी बत्ती का तथा हट्ट (झोपड़ी) को संसार का प्रतीक माना है; यथा
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट ॥
पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवौं हट्ट ॥

व्याख्या संबंधी प्रश्न
1 — निम्नलिखित पद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए
(क) सतगुरु की — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — दिखावणहार ॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘संत कबीरदास’ द्वारा रचित ‘कबीर ग्रन्थावली’ से ‘साखी’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ॥
प्रसंग- प्रस्तुत दोहे में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है ॥

व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि सद्गुरु की महिमा अपार है ॥ उन्होंने मुझे ईश्वर-दर्शन का मार्ग दिखाकर मुझ पर असीम उपकार किया है ॥ उन्होंने मुझे लौकिक (सांसारिक) दृष्टि के साथ-साथ ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान की है ॥ जिससे मैं ब्रह्म के विराट स्वरूप को देख सका और ईश्वर का साक्षात्कार कर सकने में समर्थ हो सका ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) साधारणतः मनुष्य की दृष्टि सांसारिक होती है ॥ ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए उसे दिव्यदृष्टि चाहिए, जिसे केवल सद्गुरु ही दे सकता है ॥ (2) भाषा- घुमक्कड़ी ॥ (3) शैली- मुक्तक ॥
(4) अलंकार- यमक ॥
(5) रस- शान्त ॥
(6) छन्द- दोहा ॥
(7) गुण- प्रसाद ॥
(8) शब्द-शक्ति- लक्षण ॥
(9) भावसाम्य- श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि तू साधारण दृष्टि से मेरे विराट रूप को नहीं देख सकता, इसीलिए मैं तुझे दिव्य दृष्टि देता हूँ
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम् ॥

(ख) दीपक दीया — — — — — — — — — — — आवौं हट्ट ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- प्रस्तुत साखी में शिष्य पर गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान का प्रभाव दर्शाया गया है ॥ व्याख्या- सन्त कबीर कहते हैं कि गुरु ने शिष्य के शरीररूपी दीपक को ईश्वरीय प्रेमरूपी तेल से भर दिया और उसमें ज्ञानरूपी अक्षय (अर्थात् कभी समाप्त न होने वाली) बत्ती डाल दी ॥ उसकी ज्योति से जीव की सांसारिक वासना समाप्त हो गई; अर्थात् सांसारिक भावनाओं का क्रय और विक्रय समाप्त हो गया ॥ परिणामत: जीव को आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल गई ॥ अब उसे संसाररूपी बाजार में फिर नहीं आना पड़ेगा ॥
काव्य सौन्दर्य- (1) कबीर ने प्रतीकारात्मक शैली के माध्यम से शरीर को दीपक, ईश्वरीय प्रेम को तेल तथा ज्ञान को बत्ती कहा है ॥
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) अलंकार- रूपकातिशयोक्ति ॥
(4) रस- शान्त ॥
(5) शब्दशक्ति- लक्षणा ॥
(6) गुणप्रसाद ॥
(7) छन्द- दोहा ॥

(ग) तूंतूं करता — — — — — — — — — — — — — देखो तिता ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- इस दोहे में कबीरदास बता रहे हैं कि ईश्वर का स्मरण करते-करते जीवात्मा भी परमात्मा में लीन हो जाता है और उसे जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिल जाती है ॥ व्याख्या- हे प्रभो! निरन्तर तुम्हारा नाम जपते-जपते, तुम्हारी रट लगाते-लगाते मुझसे मेरेपन का भाव (अहं भाव) जाता रहा है और मैं तुम्हारा ही रूप बन गया ॥ तब संसार में आवागमन का चक्र नष्ट हो गया अर्थात् जन्म-मरण का चक्र पूरा हो गया है, अब दुबारा जन्म नहीं लेना पड़ेगा और अब मैं सर्वत्र एकमात्र तुमको ही देखने लगा हूँ ॥ ईश्वर की कृपा से ही यह संभव हो सका है ॥ इसलिए जीवात्मा कृतज्ञतापूर्वक परमात्मा पर बलिहारी जाती है ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) भगवान के निरन्तर ध्यान से साधक भगवद् रूप ही बन जाता है- ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति (ब्रह्मज्ञानी स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ )
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) शैली- मुक्तक ॥
(4) रस- शांत ॥
(5) छन्द- दोहा ॥
(6) गुण- प्रसाद
(7) शब्द-शक्ति- लक्षणा ॥
(8) अलंकार- तद्गुण ॥
(9) भावसाम्य- आत्मा की परमात्मा से एकरूपता का भाव कबीर की इन पंक्तियों में भी दर्शनीय है
लाली मेरे लाल की, जित देखौं तित लाल ॥
लाली देखने मैं गयी, मैं भी बै गयी लाल ॥

(घ) लंबा मारग — — — — — — — — — — — — — — हरि दीदार ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- भगवान की प्राप्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैंव्याख्या- भगवान की प्राप्ति का मार्ग (साधना-पथ) बहुत लम्बा है; क्योंकि जहाँ पहुँचना है, वह घर (परमात्मा) बहुत दूर है ॥ (प्रभु-प्राप्ति का) मार्ग न केवल लम्बा है, अपितु कठिन भी है ॥ फिर इस मार्ग में बहुत-से लुटेरे (सांसारिक आकर्षण) भी मिलते हैं ॥ ऐसी स्थिति में हे सन्तों, बताइए कि भगवान के दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो?
काव्य-सौन्दर्य- (1) साधना-पथ को लम्बा इसीलिए कहा गया है कि जीव अनेक योनियों में भटकता हुआ किसी योनि में सौभाग्य से भगवान् की ओर उन्मुख होता है ॥
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) अलंकार- रूपकातिशयोक्ति ॥
(4) रस- शान्त ॥
(5)शब्द-शक्ति – लक्षणा ॥
(6) गुण- प्रसाद ॥
(7) छन्द- दोहा ॥

(ङ) यह तन जारौं — — — — — — — — — — — — — — — — — — राम पठाऊँ ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- इस ‘साखी’ में कबीरदास ने विरहिणी जीवात्मा की चरम विरहावस्था का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है ॥ व्याख्या- विरहिणी जीवात्मा कहती है कि मैं प्रियतम राम की प्रतीक्षा करते-करते थक गई, पर उनके दर्शन न पा सकी; अत: अब एक ही उपाय शेष रहता है कि मैं वियोगाग्नि में अपने शरीर को जलाकर उसकी स्याही बना लूँ और अपनी हड्डियों की कलम बनाकर उससे राम का नाम लिख-लिखकर बार-बार उनके पास भेजूं ॥ देखू वे कब तक नहीं पसीजते हैं? ॥
काव्य-सौन्दर्य- (1) जब तक साधक भगवान् के प्रेम में अपने को पूर्णत: नहीं मिटा देता, तब तक ईश्वर-प्राप्ति संभव नहीं ॥ यही आत्म-विसर्जन का भाव यहाँ कवि द्वारा बड़ी मार्मिकता से व्यंजित किया गया है ॥
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) शैलीमुक्तक ॥
(4) रस- शान्त ॥
(5) छन्द- दोहा ॥
(6) गुण- प्रसाद ॥
(7) शब्द-शक्ति- लक्षणा ॥
(8) अलंकार- रूपक तथा पुनरुक्तिप्रकाश ॥

(च) सायर नाहीं — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — गढ़ माँहि ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- प्रस्तुत साखी में कबीर ने मोक्षरूपी मोती का वर्णन करते हुए कहा है

व्याख्या- शरीररूपी किले में सुषुम्ना नाड़ी के ऊपर स्थित ब्रह्मरन्ध्र में न समुद्र है, न सीप और न ही स्वाति नक्षत्र की बूंद है, फिर भी वहाँ मोक्षरूपी मोती उत्पन्न हो रहा है; अर्थात् एक अद्भुत ज्योति का दर्शन हो रहा है ॥ सामान्य रूप से यह विख्यात है कि जब समुद्र की सीप में स्वाति नक्षत्र की बूंद पड़ती है तो वह मोती बन जाती है, परन्तु ब्रह्मरन्ध्र एक ऐसा अद्वितीय स्थल है, जहाँ पर समुद्र, स्वाति नक्षत्र की बूंद और सीप का अभाव होने पर भी मोक्षरूपी मोती उत्पन्न हो रहा हैं ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) साधन के अंतर्गत जब कुण्डलिनी ऊपर उठकर सहस्रार-चक्र (तान्त्रिक साधना में कुण्डलिनी के जागरण हेतु बताए गए आठ चक्रों में से अंतिम चक्र) में मिलती है, तब ज्योति का साक्षात्कार होता है ॥
(2) साधनात्मक रहस्यवाद का चित्रण हुआ है ॥
(3) मोक्ष प्राप्ति की ओर संकेत किया गया है ॥
(4) प्रतीकात्मकता- ‘गढ़’ शरीर का और ‘मोती’ मोक्ष का प्रतीक है ॥
(5) भाषा- पंचमेल खिचड़ी ॥
(6) अलंकार- विभावना (बिना कारण के कार्य), रूपकातिशयोक्ति एवं अनुप्रास ॥
(7) रस- भक्ति ॥
(8) छन्द- दोहा ॥

(छ) पंखि उड़ाणी — — — — — — — — — — — — — — — — — — यहु देस ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- प्रस्तुत साखी में यह मत व्यक्त किया गया है कि ब्रह्मनंद की प्राप्ति हो जाने पर, जीवात्मा पुनः सांसारिक सुख-भोग में आसक्त नहीं होती ॥ व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि जीवात्मारूपी पक्षी योग-साधना करके कुण्डलिनी के सहारे उठकर सहस्रार चक्ररूपी आकाश में पहुँच गया और उसका भौतिक शरीर इस लोक में ही पड़ा रह गया ॥ सहस्रार में उसने चोंच (इन्द्रियों) के बिना ही पानी (बह्मानंद) का पान किया (क्योंकि ब्रह्मानंद एक अलौकिक अनुभूति है, जो लौकिक, स्थूल साधनों से प्राप्त नहीं की जा सकती) ॥ उस ब्रह्मसुख का अनुभव करके जीवात्मा इस भौतिक संसार के भ्रामक सुखों को पूर्णत: भूल गई ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) जीव को सांसारिक विषय-भोग तभी तक आकृष्ट करते हैं, जब तक उसे अलौकिक आनन्द प्राप्त नहीं होता ॥
(2) ‘पंखि’ जीवात्मा का, ‘गगन’ सहस्रार का, ‘चंचु’ इन्द्रियों का और ‘जल’ अलौकिक आनन्द या ब्रह्मानंद का प्रतीक है ॥
(3) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(4) शैली- मुक्तक ॥
(5) रस- शान्त ॥
(6) छन्द- दोहा ॥
(7) अलंकार- विरोधाभास, रूपकातिशयोक्ति और ‘पाणी पीया चंच बिन’ में विभावना ॥
(8) भाव-सौन्दर्य- इसके अंतर्गत ब्रहा की सत्यता और जगत् की अनित्यता का प्रतिदान हुआ है ॥

(ज) पिंजरप्रेम …………………………………… फूटी बास ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- कबीरदास जी कहते हैं कि जब जीव के अन्दर ईश्वर का सच्चा प्रेम उत्पन्न हो जाता है तो उसकी वाणी भी रससिक्त हो उठती है ॥ व्याख्या- जीव के अन्दर जब परमात्मा का प्रेम प्रकट हुआ तो उसका हृदय अलोकिक हो उठा, अर्थात् हृदय में स्थित कामक्रोधादि विकार तथा राग-द्वेषरूपी मैल नष्ट हो जाने से हृदय पूर्णत: स्वच्छ हो गया, प्रकाशित हो उठा ॥ मुख में राम-नाम की कस्तूरी महक उठी और वाणी से प्रभु-प्रेम की सुगन्धि फूट पड़ी ॥
काव्य-सौन्दर्य-
(1) आशय यह है कि जब जीव को भगवत् प्रेम प्राप्त हो जाता है तो उसका अन्तर्बाह्य सभी आलोकिक हो उठता है और उसकी वाणी में प्रभु-प्रेम के कारण अद्भुत सरसता उत्पन्न हो जाती है, जो सुगंध से सदृश सभी को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है ॥
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) शैली- मुक्तक ॥
(4) रस- शान्त ॥
(5) छन्द- दोहा ॥
(6) अलकाररूपकातिशयोक्ति और अनुप्रास ॥

(झ) हेरत-हेरत — — — — — — — — — — — हेरी जाई ||
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- प्रस्तुत साखी में आत्मा के परमात्मा में विलय हो जाने का वर्णन किया गया है ॥

व्याख्या- कवि कहता है कि जीवात्मा अपनी सखी से कहती है कि वह परमात्मा को खोजते-खोजते स्वयं उसमें लीन हो गई है और उसका पृथक् अस्तित्व ही समाप्त हो गया है ॥ यह वैसा ही है, जैसे बूंद समुद्र में समाकर समुद्रमय हो जाती है ॥ इसके बाद उसको बूँद के रूप में अलग से नहीं खोजा जा सकता ॥ उसी प्रकार परमात्मा को जान लेने के बाद जीवात्मा और परमात्मा में कोई अन्तर ही नहीं रह जाता, दोनों एकाकार हो जाते हैं ॥
काव्य-सौन्दर्य-
(1) जीवात्मा परमात्मा का ही अभिन्न अंश है, पर अज्ञानवश वह अपने को अलग समझने लगता है ॥ जब वह पुनः परमात्मा को पाने की साधना करता है तो उसका अज्ञान नष्ट हो जाता है, और वह पुनः परमात्मा में लीन होकर अपना अलग अस्तित्व समाप्त कर देता है ॥
(2) भाषा- घुमक्कड़ी ॥
(3) शैली- मुक्तक ॥
(4) रस- शान्त ॥
(5) छन्द- दोहा ॥
(6) अलंकार- दृष्टान्त और पुनरुक्तिप्रकाश ॥
(7) भावसाम्य- रत्नाकर जी ने भी निम्नांकित पंक्तियों में आत्मा के परमात्मा में लीन होने का भाव व्यक्त किया है
जैहैं बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि कौं
बूंदता बिलैहैं बूंद बिबस बिचारि की ॥

(ञ) कबीर यहु — — — — — — — — — — — — — — — घर माहिं ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- कबीर प्रेम के मार्ग को बहुत कठिन बताते हुए कहते हैं

व्याख्या- यह घर तो प्रेम का है मौसी का नहीं, जहाँ हर कोई सरलतापूर्वक प्रवेश पा सके ॥ इसमें जाने के लिए व्यक्ति को सिर काटकर हथेली पर रखना पड़ता है, तब कहीं उसमें प्रवेश का अधिकार मिल पाता है ॥ भाव यह है कि जब साधक अपने अहं भाव को पूरी तरह मिटा देता है, तभी वह ईश्वर के प्रेम को पा सकता है ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) ईश्वर का प्रेम पाने के लिए साधक को सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर रहना होता है ॥
(2) भाषापंचमेल खिचड़ी ॥
(3) अलंकार- व्यतिरेक
(4) रस- शान्त
(5) छन्द- दोहा
(6) भावसाम्य- कविवर घनान्द ने भी प्रेम के मार्ग पर चलना बहुत कठिन बताया है
॥ प्रेम का पंथ कराल महा, तलवार की धार पै धावनो है ॥


(ट) जब मैं था — — — — — — — — — — — — देख्या माहिं ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- प्रस्तुत साखी में कवि का कथन है कि अहंकार के रहते परमात्मा को प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ अहं भाव के मिटने पर ही परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं ॥
व्याख्या- सन्त कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें अहं भाव प्रबल था अर्थात् मैं स्वयं को भगवान् से पृथक् इकाई समझता था, तब तक मुझे परमात्मा नहीं मिले ॥ जब मेरा अहंकार नष्ट हो गया, तब मुझे सर्वत्र हरि ही दिखाई पड़ते हैं ॥ वस्तुत: ज्ञानरूपी दीपक मेरे अन्दर ही स्थित था, परन्तु मुझे उसका पता न था ॥ जब मैंने उसे जलाया तो अज्ञान का सारा अन्धकार मिट गया और मुझे परमात्मा से अपनी अभिन्नता की अनुभूति होने लगी ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) परमात्मा को पाने के लिए अहंकार को मिटाना ही सबसे पहली आवश्यकता है ॥
(2) ‘दीपक’ ज्ञान का
और ‘अंधकार’ अज्ञान का प्रतीक है ॥
(3) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(4) शैली- मुक्तक ॥
(5) रस- शान्त ॥
(6) छन्द- दोहा ॥
(7) अलंकार- रूपकातिशयोक्ति ॥
(8) भावसाम्य- ऐसे ही विचार कबीर ने अन्यत्र भी व्यक्त किए हैं
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि ॥
प्रेम गली अति साँकरी, या में दो न समाहिं ॥

(ठ) बहुत दिनन थें — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — मोहिं दीन्हाँ ॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सन्त कबीर’ द्वारा रचित ‘कबीर ग्रन्थावली’ से ‘पदावली’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ॥
प्रसंग- इस पद में परमात्मा और जीवात्मा के मिलन से उत्पन्न होने वाले आनन्द का वर्णन किया गया है ॥ UP BOARD CLASS 11 HINDI KA ITIHAS काव्यांजलि हिन्दी काव्य का इतिहास

व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि मैं (जीवात्मा) बहुत दिनों के बाद परमात्मारूपी प्रियतम को पा सकी; अर्थात् जन्मजन्मान्तर की साधना के बाद ही परमात्मा से मिलन का सौभाग्य प्राप्त कर सकी ॥ यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि प्रियतम मेरे घर पर ही आ गए ॥ मैं प्रिय के आगमन की प्रसन्नता से मन-ही-मन मंगल गीत गाने लगी और जिह्वा से ईश्वरीय आनन्द का आस्वादन करने लगी ॥ मेरे मनरूपी मन्दिर में ज्ञान का प्रकाश फैल गया और मैं अपने प्रिय स्वामी को साथ लेकर मिलन का सुख भोगने लगी ॥ मुझ जैसी अकिंचन जीवात्मा के लिए परमात्मा की प्राप्ति रत्नों का खजाना मिलने जैसा है ॥ इस असाधारण उपलब्धि का कारण मेरी योग्यता नहीं है, अपितु परमात्मा की उदारता और महानता है ॥ जीवात्मा कहती है कि उसे जो सुहाग मिला है, यह परमात्मा ने उस पर कृपा करके दिया है ॥ यहाँ श्रेय परमात्मा की दयालुता को दिया गया है, जीवात्मा के किसी गुण व साधना को नहीं ॥

काव्य-सौन्दर्य-
(1) यहाँ ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण भाव व्यक्त हुआ है ॥
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) शैली- मुक्तक ॥
(4) छन्द- गेय पद ॥
(5) रस- संयोग शृंगार तथा शान्त रस ॥
(6) शब्द-शक्ति – लक्षण ॥
(7) गुण- प्रसाद और माधुर्य ॥
(8) अलंकार- रूपक ॥

(ङ) संतौ भाई आई — — — — — — — — — — — — — — — — तम षीनाँ ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- ज्ञान की प्राप्ति होते ही मोह पर आधारित समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं ॥ साधक को आत्मा अथवा परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है ॥ इसी तथ्य को कबीरदास ने ‘झोपड़ी’ और ‘आँधी’ के रूपक द्वारा स्पष्ट किया है ॥

व्याख्या- कबीरदास जी ज्ञान का महत्व बताते हुए कहते हैं कि हे भाई साधुओ! ज्ञान की आँधी आ गई है ॥ जिस प्रकार आँधी आने पर आड़ के लिए लगाई गई टटिया अर्थात् परदे उड़ जाते हैं; उसी प्रकार ज्ञान उत्पन्न हो जाने पर मेरे सारे भ्रम नष्ट हो गए हैं ॥ अब मैं वास्तविकता-अवास्तविकता का भेद समझने लगा हूँ ॥ अब मायारूपी रस्सी भी टूट गई है, अर्थात् माया के समस्त बन्धन समाप्त हो गए हैं ॥ जैसे प्रबल आँधी के वेग के कारण छप्पर में लगी दो थूनी (खम्भे) गिर जाती है, उसी प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के साथ मोह और आसक्ति के स्तम्भ भी ढह गए हैं ॥ इतना ही नहीं, तृष्णारूपी छप्पर को सँभाले हुए मोहरूपी शहतीर के टूटते ही शारीरिक अहंकाररूपी छप्पर भी गिर पड़ा अर्थात् मोह और तृष्णा के समाप्त होते ही शारीरिक अहंकार भी समाप्त हो गया ॥

जैसे छप्पर के गिरने से झोपड़ी के भीतर रखे हुए बर्तन फूट जाते हैं, उसी प्रकार शारीरिक अहंकार समाप्त होते ही मेरी दुर्बुद्धिरूपी वासनाएँ समाप्त हो गईं; अर्थात् जब तृष्णा ही नहीं रही, तब इच्छा कैसी ॥ जब ज्ञान की प्राप्ति हुई तो संतों ने वास्तविकता को समझ लिया ॥ वे समझ गए कि ये बाहरी छप्पर (माया-मोह) व्यर्थ हैं ॥ उन्होंने योग की युक्तियों एवं सद्वृत्तियों की सहायता से अपने शरीररूपी छप्पर का निर्माण किया ॥ इसका कूड़ा-करकट तुरंत बाहर निकल आया और अब शरीररूपी छप्पर में विषय-विकार रूपी जल की एक बूंद भी आने की संभावना नहीं रह गई ॥ ज्ञान की इस आँधी के बाद प्रभु के भक्तिरूपी जल की वर्षा हुई ॥ उससे समस्त भक्त-जन भीग गए; अर्थात् वे भक्ति से अभिभूत हो गए ॥ सन्त कबीरदास जी कहते हैं कि जल-वर्षा के पश्चात् ज्ञानरूपी सूर्य का उदय हुआ और अज्ञान का समस्त अन्धकार सदा के लिए समाप्त हो गया ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) सन्त कबीरदास जी के अनुसार ज्ञान और भक्ति दोनों ही साधना के फल हैं ॥ उनके मतानुसार भक्ति एवं ज्ञान अभिन्न हैं ॥
(2) ज्ञान प्राप्त होने पर माया से उत्पन्न अज्ञान के नाश होने का वर्णन बहुत आकर्षक है ॥
(3) भाषा- पंचमेल खिचड़ी ॥
(4) अलंकार- सांगरूपक तथा रूपकातिशयोक्ति ॥
(5) रस- शान्त ॥ (6) शब्द शक्ति- लक्षणा ॥
(7) गुण- प्रसाद ॥
(8) छन्द- गेयपद ॥
(9)शैली- मुक्तक ॥

(ढ) हम न मरै — — — — — सुख सागर पावा ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- इस पद में कबीरदास जी कहते हैं कि राम-भक्तिरूपी मधुर रसायन पीने वाला अमर हो जाता है ॥ केवल संसारी जीव ही बार-बार मरते और जन्म लेते हैं ॥ ॥ व्याख्या- संसार के प्राणी किसी अमर पुरुष के अभिन्न अंग नहीं हुए हैं, अत: वे सब बार-बार मरेंगे, किन्तु मैं (भगवान् का भक्त) नहीं मरूंगा; क्योंकि मुझको चिरजीवन प्रदान करने वाले प्रभु राम मिल गए हैं ॥ मेरे मन में यह बात पूर्णतः बैठ गई है कि मृत्यु से मैं नहीं मरूँगा; क्योंकि मरते केवल वे ही हैं, जो राम को नहीं जानते हैं और जिन्होंने परमतत्व का साक्षात्कार नहीं किया है ॥ राम को न जानने के कारण शाक्त (शक्ति के उपासक) मरेंगे, किन्तु राम-भक्त जीवित रहेंगे; क्योंकि वे छककर रामरूपी जीवनदायक रसायन का पान करते हैं ॥ मैंने अपने को हरि से मिलाकर एक रूप कर दिया है, इसलिए मैं तो तभी मर सकता हूँ, जब हरि (राम) स्वयं मरेंगे ॥ यदि वे नहीं मरते तो मैं भला क्यों मरूँगा ॥ कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने तो अपना मन परमात्मा में मिला दिया है और इस कारण अमरतत्व तथा चिर आनन्द की स्थिति प्राप्त कर ली है ॥ UP BOARD CLASS 11 HINDI KA ITIHAS काव्यांजलि हिन्दी काव्य का इतिहास

काव्य-सौन्दर्य-
(1) इस पद में कबीरदास जी सभी भगवदभक्तों के प्रतिनिधि के रूप में बोलते हैं, केवल अपनी ही बात नहीं कहते ॥ अतः इसमें उनका आत्मविश्वास प्रकट हुआ है, अहंकार नहीं ॥
(2) भाषा- सधुक्कड़ी ॥
(3) शैली- मुक्तक ॥
(4) छन्द- गेय पद ॥
(5) रस- शान्त ॥
(6) शब्द-शक्ति – लक्षणा ॥
(7) गुण- प्रसाद ॥
(8) अलंकार- रूपक; हरिन मरै हम काहे कूँ मरिहैं’ में वक्रोक्ति ॥
(9) भाव-साम्य- हरि-रस के पान से अमरत्व-प्राप्ति की बात कबीर ने अन्यत्र भी कही है
कबीर हरि रस यों पिया, बाकी रही न थाकि ॥
पाका कलस कुम्हार का, बहुरि न चढ़ई चाकि ॥

(ण) काहे री नलनी — — — — — — — — — — — — — — — — — — — मुए हमारे जान ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- यहाँ सन्त कबीरदास जी ने कमलिनी के माध्यम से आत्मा की स्थिति पर प्रकाश डाला है ॥
व्याख्या- इस पद की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है(i) कमलिनी के पक्ष में- सन्त कबीरदास जी कहते हैं- हे कमलिनी! तू क्यों मुरझा रही है? तेरी नाल (डण्डी) तो तालाब के जल में डूबी हुई है, फिर तेरे कुम्हलाने का क्या कारण है? तेरा जन्म जल में होता है, तू जल में रहती है और हे कमलिनी! जीवन पूर्ण करने के बाद भी तू उसी जल में लय (विलीन) हो जाएगी ॥ न तो तू नीचे से तपती है, न तेरे ऊपर ही आग है; अर्थात् न तुझे नीचे से कोई कष्ट है, न ऊपर से; क्योंकि तू जल में स्थित है ॥ फिर तेरे कष्ट (मुरझाने) का क्या कारण है? कबीरदास जी उसके मुरझाने का कारण खोज लेते हैं और पूछते हैं कि कहो, तुम्हारा किससे प्रेम हो गया है? कबीरदास जी को प्रतीत होता है कि कमलिनी का सूर्य से प्रेम हो गया है, इसीलिए वह मुरझा रही है ॥ अपना निष्कर्ष देते हुए कबीरदास जी कहते हैं कि जो परमात्मा के सामान हो गए हैं, उनकी मृत्यु कभी नहीं होती; वे तो अमर हो जाते हैं ॥ UP BOARD CLASS 11 HINDI KA ITIHAS काव्यांजलि हिन्दी काव्य का इतिहास

आत्मा के पक्ष में- कबीरदास जी जीवात्मा से कहते हैं- हे आत्मा! तू क्यों दु:खी हो रही है? तेरा मूल तो परमात्मा है ॥ परमात्मा से तेरा जन्म हुआ है, तू उसी में स्थित है और मृत्यु के पश्चात् तुझे उसी में विलीन होना है ॥ फिर तेरे कष्ट का क्या कारण है? दूसरी बात यह है कि न तो तुझे कोई सांसारिक कष्ट है और न ही कोई दैविक कष्ट ॥ दैहिक, दैविक जितने भी कष्ट होते हैं वे शरीर (जीव) को होते हैं, आत्मा को नहीं ॥ फिर कहो, तुम्हारे कष्ट का क्या कारण है? कबीरदास जी पूछते हैं कि परमात्मा को छोड़कर शायद तुम्हारा प्रेम किसी अन्य से हो गया है ॥ तात्पर्य यह है कि तुम्हें अन्य सांसारिक विषयों से जो प्रेम हो गया है, उसके कारण ही तुम दुःखी हो ॥ अन्त में कबीरदास जी कहते हैं कि हे आत्मा! तुम स्वयं परमात्मा रूप हो और जो परमात्मा-रूप होते हैं, वे कभी नहीं मरते; अर्थात् प्रभुमय होकर अमर हो जाते हैं ॥ इसलिए तुम्हें दुःखी नहीं होना चाहिए ॥

काव्य-सौन्दर्य- (1) ‘उतपित’, ‘बास’ और ‘निवास’ शब्द विचारणीय हैं ॥ ‘उतपति’ का अर्थ जन्म से, ‘बास’ का अर्थ स्थिति (स्थित होते रहने) से और ‘निवास’ का अर्थ विलीन (मृत्यु के पश्चात् लय; एकरूप) होने से है ॥
(2) प्रतीकात्मकता’नलिनी’ आत्मा का, सरोवर’ ब्रह्म-तत्व का तथा उदित’ ब्रह्म का प्रतीक है ॥
(8) भाषा- पंचमेल खिचड़ी
(4) शैली- गेय एवं प्रतीकात्मक ॥
(5) अलंकार- अन्योक्ति ॥
(6) रस- शान्त ॥
(7) शब्द-शक्ति- लक्षणा एवं व्यंजन ॥
(8) गुण- प्रसाद ॥
(9) छन्द- गेयपद ॥
(10) भावसाम्य- इसी प्रकार तुलसी भी कहते हैं
“ईश्वर अंस जीव अबिनासी ॥ “

2 — निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए
(क) सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार ॥

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘संत कबीरदास जी’ द्वारा रचित ‘साखी’ शीर्षक से अवतरित है ॥
प्रसंग- इस सूक्ति में कबीरदास जी सद्गुरु द्वारा अपने ऊपर किए गए असीम उपकार का बखान करते हुए उनके प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं ॥

व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि सद्गुरु की महिमा अनँत है, उसका वर्णन नहीं हो सकता; क्योंकि परमात्मा से अपने को जोड़ लेने के कारण सद्गुरु ही परमात्मास्वरूप हो गए है ॥ उन्होंने मुझ पर असीम उपकार किया है; क्योंकि सद्गुरु ने मुझे उस अनन्त ब्रह्म से मिला दिया, जिसे पाकर फिर कुछ भी पाना शेष नहीं रहा जाता, जीव अमर हो जाता है ॥ यह ब्रह्मप्राप्ति ही मानवजीवन का परम पुरुषार्थ है ॥ इसी महत्तम उद्देश्य की सिद्धि कराने वाले सद्गुरु की अपने ऊपर असीम कृपा का वर्णन मैं मात्र शब्दों में किस प्रकार कर सकता हूँ ॥

(ख) लंबा मारग दूरिघर, विकट पंथ बहु मार ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- इस सूक्ति में ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं का उल्लेख किया गया है ॥

व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बहुत लम्बा है और उनका घर भी बहुत दूर है ॥ यही नहीं, ईश्वरप्राप्ति के मार्ग में अनेक बाधाएँ भी आती हैं तथा साधक को अनेक प्रकार के कष्ट भी सहन करने पड़ते हैं ॥ भाव यह है कि ईश्वर के दर्शन सहज ही सुलभ नहीं हो जाते, ईश्वर की कृपा और उनके दर्शन प्राप्त करने में समय लगता है ॥ जो व्यवित निरन्तर कष्ट सहते हुए भी ईश्वर-भक्ति में अविचल भाव से लीन रहता है, वहीं ईश्वर को प्राप्त कर पाता है ॥

(ग) आठ पहर का दाक्षणा,मौपे सह्या न जाइ ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ UP BOARD CLASS 11 HINDI KA ITIHAS काव्यांजलि हिन्दी काव्य का इतिहास

प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में आत्मा परमात्मा से अपने कष्टों का निवारण करने की प्रार्थना कर रही है ॥


व्याख्या- आत्मा परमात्मा के विरह में व्याकुल है ॥ वह दिन-रात उससे मिलने के लिए तड़पती रहती है ॥ लाख प्रयत्न और अनुनय-विनय करने के पश्चात् भी उसका अपने प्रियतम से मिलन नहीं हो पाया है ॥ अन्तत: आत्मा दुःखी होकर परमात्मा से स्वयं को मार डालने की प्रार्थना करती है कि हे प्रियतम या तो तुम मुझे अपने दर्शन देकर मुझे भी अपने जैसा बना लो और यदि तुम ऐसा नहीं कर सकते तो मुझे मारकर मेरा अस्तित्व ही समाप्त कर दो; क्योंकि तुम्हारी विरहाग्नि में आठों पहर(रात-दिन) जलना अब मुझसे सहन नहीं होता हैं ॥

(घ) कबीर मोती नीप ,सुन्नि सिषर गढ़ माँहि ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- इस साखी में ब्रह्मरन्ध में स्थित मुक्तिरूपी मोती की विचित्रता का वर्णन किया गया है ॥

व्याख्या- सीप सागर में होती है, उसमें जब स्वाति नक्षत्र में होने वाली वर्षा की बूंद गिरती है, तब मोती उत्पन्न होता है, किन्तु मुक्तिरूपी मोती की उत्पत्ति बड़ी विचित्र है ॥ वह उस ब्रह्मरन्ध्र में उत्पन्न होती है, जहाँ न तो सागर है, न सीप और न ही स्वातिबूंद ॥ आशय यह है कि जब कुण्डलिनी जाग्रत होकर सुषुम्मा नाड़ी के मार्ग से ऊपर उठते-उठते ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाती है तो साधक को मुक्ति की अनुभूति होती है, जो अलौकिक है ॥ यह अनुभूति प्रकाशरूप होती है, जो हमारे अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करती है और हमें ईश्वर की ओर उन्मुख करती है ॥

(ङ) पाणी ही तैं हिम भया, हिम बैगया बिलाइ ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- इस सूक्ति में कबीरदास जी ने आत्मा एवं परमात्मा के अनन्य सम्बन्ध पर प्रकाश डाला है ॥


व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार पानी जमकर बर्फ का रूप धारण कर लेता है और वह बर्फ पिघलकर पुनः पानी के रूप में परिवर्तित हो जाता है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा से जीवात्मा का जन्म होता है और मृत्यु के समय यही जीवात्मा अपना शरीर त्यागकर पुनः उसी परमात्मा में विलीन हो जाती है ॥ इस प्रकार कबीरदास जी ने इस दार्शनिक तथ्य को स्पष्ट किया है कि आत्मा परमात्मा का ही एक अंश है ॥

(च) पाका कलस कुम्हार का, बहुरिन चढ़ई चाकि ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान् के सच्चे प्रेम से छका हुआ साधक (भक्त) जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है ॥

व्याख्या- जिस प्रकार कुम्हार का घड़ा जब आँवे में पक जाता है तो वह पुनः चाक पर नहीं चढ़ता, उसी प्रकार भगवत प्रेम से पूर्ण परिपक्व हुआ साधक अर्थात् भक्ति में पूरी तरह रँगा हुआ भक्त संसार के आवागमन के चक्र में पुन: नहीं पड़ता ॥ वह उससे मुक्त होकर ब्रह्म से एकरूप हो जाता है ॥

विशेष- कबीरदास जी का तात्पर्य है कि सांसारिक कष्टों की अनुभूति का मूल कारण अज्ञानता है ॥ ज्ञान की प्राप्ति होने पर जीवात्मा आनन्द-स्वरूप परमात्मा में ही लीन हो जाती है ॥

(छ) सीस उतारै हाथि करि,सो पैठे घर माहिं ॥ सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥
प्रसंग- इस सूक्ति में कबीरदास जी ने प्रेम के मार्ग की कठिनाईयों का उल्लेख किया है ॥

व्याख्या- माँ के बाद मौसी (माँ की बहन) का प्यार ही सर्वाधिक होता है; क्योंकि मौसी भी माँ जैसी ही होती है ॥ मौसी के घर जाना भी सरल है ॥ इसीलिए कबीर ने कहा है कि मौसी के घर जाने के समान, प्रेम के घर में प्रवेश करना सरल नहीं समझना चाहिए ॥ जो बाधाओं को सहन कर सकता है, आत्म-बलिदान करने को तत्पर है, वही प्रेम की वास्तविक अनुभूति कर सकता है ॥ तात्पर्य यह है कि प्रेम को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपना अहंकार छोड़कर प्रयास करना चाहिए ॥

(ज) बहुत दिनन थे मैं प्रीतम पाये, भाग बड़े घरि बैठे आये ॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सन्त कबीरदास’ द्वारा रचित ‘पदावली’ शीर्षक से अवतरित है ॥ प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का श्रेय परमात्मा की दयालुता को दिया गया है, जीवात्मा के किसी गुण व साधना को नहीं ॥

व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत दिनों वे पश्चात् मैं जीवात्मा अपने परमात्मा रूपी प्रियतम को पा सकी; अर्थात् कई जन्मों की लगातार साधना के उपरान्त ही मुझे परमात्मा से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो सका ॥ यह मेरा अत्यधिक सौभाग्य है कि प्रियतम परमात्मा मेरे घर ही आ गए ॥ इस असाधारण उपलब्धि का कारण मेरी योग्यता नहीं है वरन् परमात्मा की उदारता और महानता है ॥ (झ) पंडित बाद बदंते झूठा ॥ सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- इस सूक्ति में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल ईश्वर के नाम-स्मरण से ही व्यक्ति को सांसारिक आवागमन से मुक्ति नहीं मिल सकती ॥ व्याख्या- कबीरदास जी कहते हैं कि विद्वानों का यह कथन बिलकुल झूठ है कि ईश्वर के नाम लेने मात्र से ही व्यक्ति जन्ममरण के बन्धनों से छूट जाता है ॥ वास्तव में ऐसा नहीं है ॥ यदि ऐसा होता तो राम के नाम की रट लगाने वाले तोते का उद्धार हो गया होता ॥ यदि व्यक्ति को अपना उद्धार करना है तो उसे सच्चे मन से ही प्रभु का नाम-स्मरण करना होगा ॥

(ञ) काहे रीनलनीतू कुम्हिलानी, तेरेही नालि सरोवर पानी ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में ‘कमलिनी’ जीवात्मा का और ‘जल’ परमात्मा या ब्रह्म का प्रतीक है ॥ संसार के दुःखरूप होने के कारण जीवात्मा को यहाँ आनन्द नहीं मिल पाता है ॥ व्याख्या- कबीरदास जीवात्मारूपी कमलिनी से पूछते हैं कि हे कमलिनी तू क्यों मुरझा रही है? तेरी नाल तो परमात्मारूपी सरोवर के जल में डूबी रहती है, जहाँ से तुझे निरन्तर आनन्दरूपी जीवन रस मिलता रहता है ॥ यदि तू कूम्हला रही है तो इसका एकमात्र कारण मुझे यही दिखाई पड़ता है कि तेरा सम्बन्ध अब उस जल से न रहकर किसी और चीज से हो गया है; अर्थात् हे जीवात्मा! तेरे दुःख का कारण परमात्मा से ध्यान हटाकर मोहग्रस्त हो जाना है ॥

(ट) कहै कबीरजे उदिक समान;ते नहीं मुएहमारे जान ॥ UP BOARD CLASS 11 HINDI KA ITIHAS काव्यांजलि हिन्दी काव्य का इतिहास

सन्दर्भ- पूर्ववत् ॥ प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में कबीरदास जी ने कमलिनी के माध्यम से आत्मा की स्थिति पर प्रकाश डाला है ॥ व्याख्या- कबीर ने कमलिनी को सम्बोधित करते हुए कहा है कि हे कमलिनी! तेरा जन्म जल में हुआ है और जल में ही तू रहती है ॥ इस रूप में ‘कमलिनी’ आत्मा का और ‘जल’ परमात्मा का प्रतीक है ॥ कबीर का मत है कि जो स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो गए हैं, वे कभी भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते ॥ ब्रह्मस्वरूप हो जाने पर मृत्यु से कैसा भय? इस प्रकार प्रस्तुत सूक्ति में आध्यात्मिक और दार्शनिक चिन्तन को आधार बनाया गया है ॥

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न
1 — गुरु के स्वरूप और महत्व पर कबीरदास जी के विचार प्रकट कीजिए ॥
उत्तर—- – कबीरदास ने गुरु के स्वरूप और उसकी महत्ता का वर्णन करते हुए कहा है कि मैं अपने उन गुरु को अपना शरीर बार-बार अर्पित कर देना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझको अविलंब मनुष्य से देवता बना दिया ॥ उन्होंने मुझ पर अनेक उपकार किए हैं ॥ उन्होंने मुझे दिव्यदृष्टि प्रदान की और अनन्त ब्रह्म के दर्शन कराए हैं ॥ कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु ने शिष्य के शरीररूपी दीपक को ईश्वरीय प्रेमरूपी तेल से भर दिया और उसमें ज्ञानरूपी कभी समाप्त न होने वाली बत्ती डाल दी ॥ जिसकी ज्योति से जीव की सांसारिक वासना समाप्त हो गई ॥ गुरु ही हमें भवसागर में डूबने से बचाया है उनकी कृपा से ही हमने देख लिया कि हमारी नाव अत्यन्त जर्जर है ॥ गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान के कारण ही हमारा सांसारिक मोह समाप्त हो गया और हम भव सागर से पार हो गए ॥

2 — कबीरदास जी ने भगवन प्राप्ति के मार्ग में आने वाली किन कठिनाईयों का वर्णन किया है?
उत्तर—- – कबीरदास जी ने भगवन प्राप्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन करते हुए कहा है कि भगवान की प्राप्ति का मार्ग (साधना-पथ) बहुत लंबा है ॥ जिसमें चलते-चलते अर्थात् साधना करते-करते पूरा जीवन लग जाता है ॥ वह रास्ता कठिन है उसमें परिवार, माया एवं अन्य सांसारिक आकर्षण आदि अनेक बाधाएँ है ॥ परमात्मा का घर भी बहुत दूर है ॥ रास्ता न केवल लंबा है अपितु बीहड़ भी है ॥ रास्ते में बहुत से लुटेरे (काम, क्रोध, लोभ, मोह) भी मिलते हैं जो साधक को वहाँ पहुँचने से रोकते है ॥
3 — कबीरदास जी के अनुसार व्यक्ति परमात्मा के प्रेम का अधिकारी कब बनता है?
उत्तर—- – कबीरदास जी के अनुसार व्यक्ति परमात्मा के प्रेम का अधिकारी तब बनता है जब व्यक्ति के अंदर से अहं का भाव समाप्त हो जाता है ॥ परमात्मा का प्रेम वही पा सकता है, जो अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर हो ॥


4 — कबीरदास जी ने जीवात्मा और परमात्मा की अभिन्नता का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर—- – कबीरदास जी ने जीवात्मा और परमात्मा की अभिन्नता का वर्णन करते हुए कहा है कि जीवात्मा बहुत दिनों बाद प्रियतम परमात्मा को प्राप्त कर पाई है ॥ जन्म-जन्मान्तर की साधना के बाद ही उसे अपने प्रियतम प्राप्त हुए है ॥ कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक जीवात्मा में परमात्मा से मिलन की इच्छा जाग्रत नहीं होगी तब तक उसे परमात्मा के दर्शन नहीं हो सकते ॥ जीवात्मा के लिए परमात्मा की प्राप्ति रत्नों का खजाना मिलने जैसा है ॥


5 — राम-नाम के उच्चारण मात्र से मुक्ति नहीं मिल सकती ॥ कबीरदास जी ने ऐसा क्यों कहा? इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने क्या तर्क दिए?
उत्तर—- – राम-नाम के उच्चारण मात्र से मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति नहीं हो सकती ऐसा कबीरदास जी ने इसलिए कहा है कि अगर राम नाम के उच्चारण मात्र से मुक्ति मिलती तो सभी व्यक्तियों को जन्म-मृत्यु के आवागमन से मुक्ति मिल जाती ॥ इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने तर्क प्रस्तुत किए है ॥ कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कहने मात्र से सबकुछ हो जाए तो खाँड का नाम लेते ही व्यक्ति का मुंह मीठा हो जाना चाहिए ॥ आग कहने मात्र से पैर जल जाने चाहिए, जल कहते ही प्यास बुझ जानी चाहिए, भोजन कहते ही भूख भाग जानी चाहिए और नाममात्र का उच्चारण करके संसार का प्रत्येक प्राणी भवसागर से तरकर मोक्ष प्राप्त कर ले ॥

काव्य-सौन्दर्य से संबंधित प्रश्न
1 — “सतगुरु की — — — — — — — — — — — — — — दिखावणहार ॥ “पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार तथा छन्द का नाम लिखिए ॥
उत्तर—- – प्रस्तुत पंक्तियों में यमक अलंकार तथा दोहा छंद का प्रयोग हुआ है ॥
2 — “चिंतातौ हरि नाँव — — — — — — — — — — — — — — — की पास ॥ “पंक्तियों में प्रयुक्त रस तथा उसका स्थायी भाव बताइए ॥
उत्तर—- – प्रस्तुत पंक्तियों में शांत रस का प्रयोग है जिसका स्थायी भाव निर्वेद है ॥
3 — “पाणी ही तैं — — — — — — — — — — — — — कहा न जाइ ॥ “पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार तथा रस बताइए ॥
उत्तर—- – प्रस्तुत पंक्तियों में अन्योक्ति अलंकार तथा शांत रस प्रयुक्त हुए है ॥
4 — “नैना अंतरि — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — देखन देउँ ॥ “पंक्तियों में प्रयुक्त रस तथा अलंकार लिखिए ॥
उत्तर—- – प्रस्तुत पंक्तियों में भक्ति से पुष्ट श्रृंगार रस तथा अनुप्रास अलंकार है ॥

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