राष्ट्र का स्वरूप पाठ का सारांश

राष्ट्र का स्वरूप पाठ का सारांश

प्रस्तुत निबन्ध राष्ट्र का स्वरूप डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के निबन्ध-संग्रह पृथिवी पुत्र’ से लिया गया है ।। इस निबन्ध में लेखक बताते हैं कि राष्ट्र का स्वरूप जिन तत्त्वों से मिलकर बना है, वे तीन तत्व हैं-पृथ्वी (भूमि), जन और संस्कृति ।। ।।

पृथ्वी को समृद्ध बनाने पर बल


लेखक का मानना है कि भूमि का निर्माण देवताओं द्वारा किया गया है तथा इसका अस्तित्व अनन्तकाल से विद्यमान है ।। इसलिए मानव जाति का यह कर्तव्य है कि वह इस भूमि के प्रति सचेत रहे, इसके रूप को विकृत न होने दे तथा इसे समृद्ध बनाने की दिशा में सजग रहे ।। लेखक का कहना है कि भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितना अधिक जागरूक रहेंगे, हमारीnराष्ट्रीयता उतनी ही बलवती होगी, क्योंकि हमारी समस्त विचारधाराओं की जननी वस्तुत: यह पृथ्वी ही है ।। जो राष्ट्रीय विचारधारा पृथ्वी से सम्बद्ध नहीं होती, वह आधारविहीन होती है और उसका अस्तित्व थोड़े समय में ही नष्ट हो जाता है ।। राष्ट्रीयता का आधार जितना सशक्त होगा, राष्ट्रीयता की भावनाएँ भी उतनी ही अधिक विकसित होंगी ।। इसलिए प्रारम्भ से अन्त तक पृथ्वी के भौतिक स्वरूप की जानकारी रखना तथा इसके रूप-सौन्दर्य, उपयोगिता एवं महिमा को पहचानना प्रत्येक मनुष्य का आवश्यक धर्म है ।। .

पृथ्वी : हमारी धरती माता


लेखक का मानना है कि यह पृथ्वी (भूमि) वास्तव में हमारे लिए माँ है, क्योंकि इसके द्वारा दिए गए अन्न-जल से ही हमारा भरण-पोषण होता है ।। इसी से हमारा जीवन अर्थात् अस्तित्व बना हुआ है ।। धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हुई हैं, उनसे हमारा आर्थिक विकास सम्भव हुआ है और आगे भी होगा ।। पृथ्वी एवं आकाश के अन्तराल में जो सामग्री भरी हुई है, पृथ्वी के चारों ओर फैले गम्भीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियां हैं, उन सबका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है ।। अत: हमें इन सबके प्रति आत्मीय चेतना रखने की आवश्यकता है ।। इससे हमारी राष्ट्रीयता की भावना को विकसित होने में सहायता मिलती है ।।

राष्ट्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग : मनुष्य


लेखक का मानना है कि पृथ्वी अर्थात् भूमि तब तक हमारे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकती, जब तक इस भूमि पर निवास करने वाले मनुष्य को साथ में जोड़कर न देखा जाए ।। जो भूमि जनविहीन हो, उसे राष्ट्र नहीं माना जा सकता ।। राष्ट्र के स्वरूप का निर्माण पृथ्वी और जन (मनुष्य) दोनों की विद्यमानता की स्थिति से ही सम्भव है ।। ’पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका आज्ञाकारी पुत्र हूँ’, इस भावना के साथ तथा माता-पुत्र के सम्बन्ध की मर्यादा को स्वीकार करके प्रत्येक देशवासी अपने राष्ट्र एवं देश के लिए कार्य करते हुए अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सजग हो सकता है ।। पृथ्वी पर रहने वाले जनों का विस्तार व्यापक है और इनकी विशेषताएँ भी विविध हैं ।। वस्तुतः जन का महत्त्व सर्वाधिक है ।। जन के बिना राष्ट्र की कल्पना करना भी असम्भव है ।।

राष्ट्र क विकास समानता के भाव द्वारा ही सम्भव


प्रत्येक माता अपने सभी पुत्रों को समान भाव से प्रेम करती है ।। इसी प्रकार पृथ्वी भी उस पर रहने वाले सभी मनुष्यों को समान भाव से चाहती है, उसके लिए सभी मनुष्य समान हैं ।। इसलिए धरती माता अपने सभी पुत्रों को समान रूप से समस्त सुविधाएँ प्रदान करती है ।। धरती पर रहने वाले मनुष्य भले ही अनेक जातियों, धर्मों, समुदायों से सम्बन्ध रखते हों, किन्तु फिर भी ये सभी मातृभूमि के पुत्र हैं, मातृभूमि के साथ उनका जो सम्बन्ध है, उसमें कोई भेदभाव उत्पन्न नहीं हो सकता ।। धरती पर सब जातियों के लिए एक समान क्षेत्र है ।। इसलिए सभी मनुष्यों को देश की प्रगति और उन्नति करने का एक समान अधिकार है ।। किसी एक जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता ।। अत: सभी को एक समान रूप से प्रगति और उन्नति करने का अवसर मिलना चाहिए उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए ।। ।।
समस्त देशवासियों का यह कर्त्तव्य है कि वे अपने निजी स्वार्थों को त्यागकर तथा संकुचित दायरे से निकलकर उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण अपनाएँ ।। इस प्रकार समानता के भाव द्वारा ही राष्ट्र की प्रगति सम्भव है ।।

संस्कृति : मनुष्य के दिमाग का प्रतीक


लेखक का मानना है कि यह संस्कृति ही जन का दिमाग है और संस्कृति के विकास एवं अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है ।। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है ।। अगर भूमि और जन को संस्कृति से अलग कर दिया जाए तो राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता ।। किसी भी राष्ट्र के लिए संस्कृति उसकी जीवनधारा है ।। प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ संस्कृति का विकास करती है ।। इस प्रकार प्रत्येक जन अपनी भावना के अनुसार अलग-अलग संस्कृतियों को राष्ट्र के रूप में विकसित करता है ।। अनेक संस्कृतियों के एक साथ रहने के बावजूद सभी संस्कृतियों का मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता एवं समन्वय की भावना है ।। यही हमारे बीच पारस्परिक प्रेम एवं भाईचारे का स्रोत है तथा इसी से राष्ट्रीयता की भावना को बल मिलता है ।। लेखक का मानना है कि सहृदय व्यक्ति प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकार करता है |

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